Friday, August 19, 2005

संस्कृत भाषा के रहस्य

योग का व्यावहारिक रूप है संस्कृत भाषा के रहस्य -शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
दुनिया की पहली पुस्तक की भाषा होने के कारण संस्कृत भाषा को विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं कोई संशय की गुंजाइश नहीं हैं।इसके सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिध्द है।
सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी हाने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है। इतना सब होने के बाद भी बहुत कम लोग ही जानते है कि संस्कृत भाषा अन्य भाषाओ की तरह केवल अभिव्यक्ति का साधन मात्र ही नहीं है; अपितु वह मनुष्य के सर्वाधिक संपूर्ण विकास की कुंजी भी है। इस रहस्य को जानने वाले मनीषियों ने प्राचीन काल से ही संस्कृत को देव भाषा और अम्रतवाणी के नाम से परिभाषित किया है। संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं वल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं वल्कि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है । जिस प्रकार साधारण पकी हुई दाल को शुध्द घी में जीरा; मैथी; लहसुन; और हींग का तड़का लगाया जाता है;तो उसे संस्कारित दाल कहते हैं। घी ; जीरा; लहसुन, मैथी ; हींग आदि सभी महत्वपूर्ण औषधियाँ हैं। ये शरीर के तमाम विकारों को दूर करके पाचन संस्थान को दुरुस्त करती है।दाल खाने वाले व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता कि वह कोई कटु औषधि भी खा रहा है; और अनायास ही आनन्द के साथ दाल खाते-खाते इन औषधियों का लाभ ले लेता है।
ठीक यही बात संस्कारित भाषा संस्कृत के साथ सटीक बैठती है।जो भेद साधारण दाल और संस्कारित दाल में होता है ;वैसा ही भेद अन्य भाषाओं और संस्कृत भाषा के बीच है।संस्कृत भाषा में वे औषधीय तत्व क्या है ? यह जानने के लिए विश्व की तमाम भाषाओं से संस्कृत भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है।
संस्कृत में निम्नलिखित चार विशेषताएँ हैं जो उसे अन्य सभी भाषाओं से उत्कृष्ट और विशिष्ट बनाती हैं।
१ अनुस्वार (अं ) और विसर्ग(अ:)
सेस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभ दायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग। पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं —
यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि।
और
नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं—
यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।
अब जरा ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।
उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भौंरे की तरह गुंजन करना होता है, और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जावेगा।

कपालभाति और भ्रामरी प्राणायामों से क्या लाभ है? यह बताने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि स्वामी रामदेव जी जैसे संतों ने सिद्ध करके सभी को बता दिया है। मैं तो केवल यह बताना चाहता हूँ कि संस्कृत बोलने मात्र से उक्त प्राणायाम अपने आप होते रहते हैं।
जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- '' राम फल खाता है``

इसको संस्कृत में बोला जायेगा- '' राम: फलं खादति"
राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है।
संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना।

२- शब्द-रूप
संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार 25 रूप बनते हैं।
यथा:- रम् (मूल धातु)
राम: रामौ रामा:
रामं रामौ रामान्
रामेण रामाभ्यां रामै:
रामाय रामाभ्यां रामेभ्य:
रामत् रामाभ्यां रामेभ्य:
रामस्य रामयो: रामाणां
रामे रामयो: रामेषु
हे राम! हेरामौ! हे रामा:!

ये 25 रूप सांख्य दर्शन के 25 तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है। और इन 25 तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है।
सांख्य दर्शन के 25 तत्व निम्नानुसार हैं।-
आत्मा (पुरुष)
(अंत:करण 4 ) मन बुद्धि चित्त अहंकार
(ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण
(कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्
(तन्मात्रायें 5) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द
( महाभूत 5) पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश

३- द्विवचन
संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है।
जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।

४ सन्धि
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐंसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।
''इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।
यथा:- १ इत्यहं जानामि।
२ अहमिति जानामि।
३ जानाम्यहमिति ।
४ जानामीत्यहम्।
इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं नीरोग हो जाता है।
इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे देवभाषा और अमृतवाणी कहते हैं।

(-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे)

38 comments:

Anonymous said...

aap yahoo online chat kee jankari bhee is webpage per de taaki log us samay upasthit ho aur unhe poori prikriya ke baare me avgat kare easy_sanskrit@yahoo.com per email icchuk logo ke magwa len

Anonymous said...

आपके इस सराहनीय प्रयास के लिए धन्यवाद.

Anonymous said...

संस्कृत शब्दों के उच्चारण की भी व्यवस्था कर दें तो फिर सोने पर सुहागा हो जाएगा।
-सस्कृत प्रेमी

रुपेश कुमार तिवारी said...

इस दिव्य प्रयास के लिए हार्दिक धन्यवाद !
यह प्रक्रिया चलते रहने दिजियेगा और नये पाठ भी डालते रहियेगा |

Anonymous said...

अतीव सुन्दरः प्रयासः अस्ति| कृपया,पाठान् नियमितः लिखतु|

nIlagrIva said...

श्लाघनीयं कार्यं क्रियते भवद्बिः । येषां हिन्दी-भाषा-परिचयः नास्ति तेषां मादृशानां उपयॊगाय सुलभसंस्कृतेन वा आङ्ग्लेन वा लिख्यते चेत् इतोऽपि समीचीनं भवेदिति मम विचारः ।

जीयात् गीर्वाणभारती ।

nityagopal said...

aadarniy mitro! aapki pratikriya se mera parishram sarthak ho gaya hai , main to samajhta tha ki sanskrit men kavita likhna arany rodan hai par aaj samajha ki abhi bhi sanskrit janane valon ki kami nahin hai,.bahu bahu dhanybadah our kavita padhne ke liye www.hindikonpal.blogspot.com dekhen
our easy_sanskrit@yahoo.com par sunday 7:30 pm on line hokar sanskrit ka aanand len, www.sanskritbhasha.blogspot.com
shastri nityagopal katare

उन्मुक्त said...

संस्कृत भाषा के उच्चारण का योग के सम्बन्ध के बारे मे पहली बार पता चला। यह बताने के लिये धन्यवाद।

Anonymous said...

dear sir
you have done great thing. your effort will give strength to hindu, sanskrit and bharatiyata. You have created very easy teaching pettern to learn sanskrit. Koti Koti dhanyawad.
Sastang
Sonal tyagi

shubham katare said...

aapki icchaanusar uccharan ki bhi vyavastha kar dee gai hai dekhen
www.geetavani.blogspot.com

Anonymous said...

mtv music video

SANDIP NARAYAN said...

Pranam Mahoday!
It is a great service you are doing to the Nation. For this we are all grateful to you.

Aasha hai aapke satat sat-prayas se hum sabhi log labhanvit honge aur Sanskrit seekhne ke baad hum bhi kuch dene ki koshish karenge aane vali santati (generation) ko.

Bahut-bahut Dhanyavad!

Pradeep said...

do you have any sanskrit drama for teaching spoken sanskrit?. I am a sanskrit teacher in an international school I want to improve students spoken. can you help me for this? if you can please send me information about this on my email my email adress is "pradeepupadhyay1@gmail.com
School adress is "atmiya Vidya Mandir Kolibharthana,taluka kamrej, Distt. surat, gujarat. mobile no. 9824493902

दिवाकर मिश्र said...

डॉ. व्योम जी आपका प्रयास सराहनीय है और निश्चय ही इससे लोगों को लाभ मिल रहा होगा । आप संस्कृत की विशेषताओं को योग से जोड़कर बताते हैं यह भी अच्छा है । परन्तु कहीं कहीं आप अतिशयोक्ति कर जाते हैं जो लोगों में श्रद्धा कम करने का कारण बन सकती है । तथ्य निरूपण में अतिशयोक्ति ठीक नहीं । जैसे अन्य सभी भाषाओं में शब्दों का केवल एक ही रूप है, संस्कृतभाषा में कोई ऐसा शब्द नहीं है जिसमें अनुस्वार औस विसर्ग न हों । शास्त्री जी की के ये वाक्य सही नहीं हैं ।
दूसरी भाषाओं में भी शब्दों के रूप होते हैं जैसे हिन्दी में-
लड़का, लड़के (सामान्य)
लड़के, लड़कों (परसर्ग के साथ)
लड़के, लड़को (सम्बोधन)
अंग्रेजी में-
go, went, gone, going, goes, to go इत्यादि
be, been, is, am, are, were, was, being, to be इत्यादि
good, better, best, goodness इत्यादि
child, children, children's, childish, childhood इत्यादि

संस्कृत में भी बिना अनुस्वार और विसर्ग के वाक्य बन सकते हैं । यह कथ्य की प्रकृति और विवक्षा पर निर्भर करता है । छोटे वाक्य जैसे- रामो गच्छति, सीता अपि तेन सह एव गच्छति । या बड़े वाक्य जैसे- आसीत् पुरा पाकशासन इवापरः राजा शूद्रको नाम । (कादम्बरी के प्रथम वाक्य का प्रधान उपवाक्य)

मुझे भी आपका प्रयास देखकर प्रसन्नता होती है परन्तु आपको चाहे संस्कृत के प्रति अरुचि से साक्षात्कार होता हो, हमारा तो साक्षात्कार संस्कृत की आलोचना, निन्दा और विरोध से भी होता है । इसलिए मेरे ऐसा कहने का उद्देश्य है कि जो कहें, यथासम्भव पक्की बात कहें वैसे निन्दा करने वाले तो छिद्र ढूँढ़ ही लेते हैं पर हमारा प्रयास तो हो सकता है कि हम यथासम्भव अनिन्दनीय बनें । यदि कोई आलोचना करता है तो हमें उसे पूर्वाग्रह से ग्रस्त मानकर उपेक्षित नहीं करना चाहिए बल्कि अपना परिष्कार करना चाहिए जो कि एक अच्छा विकल्प है ।
इनके अलावा अन्य वाक्य भी हैं जो सत्य तो हैं पर अतिशयोक्तिपूर्ण । संस्कृतभाषा में स्वयं ही ऐसी बातें हैं कि प्रभावित करने के लिए अतिशयोक्ति की आवश्यकता नहीं है ।

Anonymous said...

व्योम जी आपका प्रयास सराहनीय है |संस्कृत भाषा के उच्चारण का योग के सम्बन्ध के बारे मे बताने के लिये धन्यवाद।


Rishikesh

NAARI TODAY said...

srimaan ji main dhanya ho gaya...main sunta tha ki sanskrit vaigyanik bhasha hai,,,par aaj samja hai hai...mera intrest badraha hai.....aaj main shaan se sanskrit ki baat kar sakta hoon....yog se jo aapne joda hai mujhe to aapne 1 hathyar de diya,,,,charcha ke liye....thanx....shat shat pranam aapke pryaason ko...

Samartha said...

jaankaari ke liye apka shukriya. Aapka prayas sarahniya hai.

Anonymous said...

This revelation (साक्षात्कार) has been most amazing to me and has inspired me to continue my efforts in learning sanskrit. Please keep the good work going without feeling put-down by so-called constructive criticism.

संजीव सलिल said...

सीख-सिखाना संस्कृत, है सारस्वत यज्ञ.
संपादित इस यज्ञ को, करते केवल विज्ञ.
करते केवल विज्ञ देव भाषा में बातें
अज्ञ किया करते हैं अंग्रेजी में घातें.
घातें करते 'सलिल' व्यर्थ है गाल बजाना.
सार्थक अनुष्ठान है संस्कृत सीख-सिखाना

संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम
संजिव्सलिल.ब्लॉग.सीओ.इन
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

Anonymous said...

संस्कृत भाषा के उच्चारण का योग के सम्बन्ध के बारे मे पहली बार पता चला। इस दिव्य प्रयास के लिए हार्दिक धन्यवाद ! कृपया,पाठान् नियमितः लिखतु| संस्कृत शब्दों के उच्चारण की भी व्यवस्था कर दें .

Anonymous said...

संस्कृत भाषा के उच्चारण का योग के सम्बन्ध के बारे मे पहली बार पता चला। इस दिव्य प्रयास के लिए हार्दिक धन्यवाद ! कृपया,पाठान् नियमितः लिखतु| संस्कृत शब्दों के उच्चारण की भी व्यवस्था कर दें .

कटारे said...

उच्चारण सीखने के लिये कृपया यहाँ जायें
www.sanskratseekho.blogspot.com
www.geetavani.blogspot.com

Rakesh said...

कटारे जी आपको बहुत बहुत धन्यवाद | आपका प्रयाद कबीले तारीफ है | आज संस्कृत सीखना काफी मुस्किल हो गया है, कटारे जी कुछ ऐसा कीजिये की एक बच्चा भी इस वेबसाइट से संस्कृत सिख सके |

धन्यवाद
राकेश

mohammad khalil said...

bahut hi chchha likhein hein aap ki ish bhasa ka gyan jo koi vyakti hasil kar lega uska jivan sach mein ujjaval ho jayega mujhe yah jankari padhhkar bahut hi achchha laga iske liye bahut bahut dhnyavad

khalil shah bastvi

Anonymous said...

aap log to pagal ho karyapatrika to do

Anonymous said...

aam ke aam aur guthly ke daam
waly baat
isliye ise DEVBHASA khte hai...Pappu bishnoi.

Dr.Sushila Gupta said...

aadarneeya Katareji,

namaskar,

sanskrit ke vikas ke lie aapke dwara kiya gaya prayas sarahneeya hai. aapko kotishah naman , vandan, abhinandan.

RAJNARAYAN TIWARI said...

NAMSKAR JIGYASA AUR ABHAV KE SAATH JUDA HI MANUSAY JIWAN HAI.JISME SABD,TAAL AUR LAY KA SUMDHUR SANGM HAI.JISKA DARSAN AAPKE MADYAM SE HUA.SUBH-KAMNA OMSAIRAM PT.RAJYNARAYN TIWARI 099777-26504

Sunita Pradhan said...

सराहनीय लेख।आभार।

Kundan Tanganiya said...

मिश्रा जी - संस्कृतभाषा में "कोई ऐसा शब्द नहीं" है जिसमें अनुस्वार औस विसर्ग न हों । शास्त्री जी की के ये वाक्य सही नहीं हैं ।
लेखक "कोई ऐसा वाक्य नही"

Kundan Singh Tanganiya

shyam naresh dixit said...
This comment has been removed by the author.
shyam naresh dixit said...
This comment has been removed by the author.
Manish said...

जो साध्य योग से प्राप्त होता है, वह साध्य सत्य संकल्प के साथ,आसन पर बैठ कर,रोजाना सभी राम शब्दो के कारक चिह्न के साथ अर्थो पर इसी क्रम में मनन्, चिन्तन करेने से निश्चित ही प्राप्त होगा। सभी दर्शनो के सारभुत अर्थ की प्राप्ति होगी।

Manish said...

जो साध्य योग से प्राप्त होता है, वह साध्य सत्य संकल्प के साथ,आसन पर बैठ कर,रोजाना सभी राम शब्दो के कारक चिह्न के साथ अर्थो पर इसी क्रम में मनन्, चिन्तन करेने से निश्चित ही प्राप्त होगा। सभी दर्शनो के सारभुत अर्थ की प्राप्ति होगी।

Maheshkumar Banjare said...

मुझेे तो लगता हैें संस्‍कृृत भाषा दुसरे ग्रह से आये लोगो की भाषा है जिसे प्राचीन ग्रंथो मे देव कहा गया है़ चूंकि इतना वैैज्ञानिक भाषा अति उन्‍नत लोगो का ही हाेे सकता है

sanskrit tutorial said...

ONLINE SURVEY ON SAMSKRIT EDUCATION
ONGC (CSR) सहयोगेन संस्कृत-संवर्धनप्रतिष्ठानेन राष्ट्रियस्तरे संस्कृतविषयकम् एकं सर्वेक्षणं क्रियमाणं विद्यते, अस्मिन् सर्वेक्षणे अधोलिखितवर्गीकरणानुसारं भागग्रहणं कुर्युः –
1. प्रशासनिकस्तरः (संस्कृतविभाग:) विद्यालये संस्कृतप्रशासकः महाविद्यालये / विश्वविद्यालये
2. संस्कृत शिक्षक- विद्यालय / महाविद्यालय / विश्वविद्यालय
3. संस्कृत छात्र- विद्यालय / महाविद्यालय / विश्वविद्यालय
संस्कृतेन पूरयितुम् अत्र नुदन्तु ।
ONGC (CSR) के सहयोग से संस्कृत-संवर्धन-प्रतिष्ठान के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे संस्कृत-शिक्षा से सम्बद्ध सर्वेक्षण में निम्नलिखित श्रेणी के अनुसार भाग ग्रहण करें -
1. प्रशासनिकस्तर (संस्कृत विभाग) - विद्यालय / महाविद्यालय / विश्वविद्यालय
2. संस्कृत शिक्षक- विद्यालय / महाविद्यालय / विश्वविद्यालय
3. संस्कृत छात्र- विद्यालय / महाविद्यालय / विश्वविद्यालय

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https://samskritpromotion.in/survey/index.php

Zunnu rain said...

Sanskrit shalaka ka chart kaise banate hain plz bataiye

खर्कतड़ी said...

रामात्। अपादान कारक। सुधार करो।